400 साल पुरानी परंपरा! जानिए मोहर्रम में हाथी पर क्यों निकाला जाता है बीबी का अलम
चारमीनार के साये में हर साल मोहर्रम की 10 तारीख यानी यौम-ए-आशूरा को निकलने वाला बीबी का अलम जुलूस सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि हैदराबाद की गंगा-जामुनी तहज़ीब और 400 साल पुराने शाही इतिहास का जीवंत प्रतीक है. कुतुब शाही दौर से शुरू हुई यह ऐतिहासिक रिवायत आज भी अपने उसी पुराने रस्म-ओ-रिवाज़ और अकीदत यानी आस्था के साथ जारी है. इस बेहद पाक और ऐतिहासिक जुलूस की शुरुआत गोलकुंडा के कुतुब शाही राजवंश के दौरान हुई थी.
माना जाता है कि राजा अब्दुल्ला कुतुब शाह की वालिदा, हयात बख्शी बेगम ने इस जुलूस की नींव रखी थी. इस अलम में पैगंबर मोहम्मद की साहबजादी हजरत फातिमा-ए-ज़ेहरा के पवित्र तबर्रुक यानी लकड़ी के तख्त का एक हिस्सा को शामिल किया गया है. कुतुब शाही राजाओं के बाद, हैदराबाद के आसफ जाही शासकों यानी निजामों ने भी इस परंपरा को पूरे राजकीय सम्मान के साथ आगे बढ़ाया और इसे दबीरपुरा के बीबी का अलावा में स्थापित किया.
दक्कन के दरबारों में सम्मान और गरिमा का प्रतीक माना जाता था
इस ऐतिहासिक जुलूस की सबसे बड़ी खासियत इसके लिए इस्तेमाल होने वाले शाही हाथी रहे हैं. दक्कन के दरबारों में हाथियों को सर्वोच्च राजकीय सम्मान और गरिमा का प्रतीक माना जाता था. इसी वजह से इस मुकद्दस यानी पवित्र अलम को हमेशा एक सजे-धजे शाही हाथी पर ही ले जाया जाता रहा है. इतिहास के पन्नों को पलटें तो दशकों पहले इस जिम्मेदारी को हैदरी नाम का एक प्रसिद्ध हाथी निभाता था. हैदरी के बाद, यह गौरवशाली परंपरा उसकी संतान रजनी नाम की हथिनी ने संभाली, जिसने सालों तक पुराने शहर की गलियों में इस पवित्र अलम को अपने कांधे पर उठाया. बीच के कुछ वर्षों में हाशमी नाम के हाथी ने भी इस सेवा को पूरा किया.
रजनी हथिनी मोहर्रम के पाक जुलूस का हिस्सा बनती रही
दिलचस्प बात यह है कि रजनी हथिनी न सिर्फ मोहर्रम के इस पाक जुलूस का हिस्सा बनती रही, बल्कि हैदराबाद के पारंपरिक बोनालु उत्सव में भी बढ़-चढ़कर शामिल होती रही जो शहर के सांप्रदायिक सौहार्द को दर्शाता है. वक्त के साथ भले ही हाथियों की बढ़ती उम्र और फिटनेस के कारण अब दूसरे राज्यों जैसे महाराष्ट्र से प्रशिक्षित हाथियों को इस सेवा के लिए लाया जाने लगा हो, लेकिन अकीदत का यह कारवां आज भी वैसा ही है. आज भी जब यह जुलूस निकलता है, तो जात-पात और मजहब से परे, हजारों-लाखों लोग इस शाही और रूहानी परंपरा के दीदार के लिए उमड़ पड़ते हैं.

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