राज्यसभा चुनाव से पहले झारखंड में सियासी घमासान, नारे ने बदल दिए समीकरण
नई दिल्ली। झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर होने वाले चुनाव से ठीक पहले राज्य का राजनीतिक पारा अचानक चढ़ गया है। चुनावी दावों और विधायकों की जोड़-तोड़ की आशंकाओं के बीच '56 नहीं, 61' का एक नया नारा चर्चा में आ गया है। इस अनोखे नारे के सामने आने के बाद राज्य के सियासी गलियारों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, जिसने इस पूरे चुनाव को और भी ज्यादा दिलचस्प बना दिया है।
क्या है '56 नहीं, 61' के नारे का असली मतलब?
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के महासचिव विनोद कुमार पांडेय के एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद यह नारा हर तरफ गूंज रहा है। असल में, झारखंड विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के हिसाब से सत्तारूढ़ महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं। राज्यसभा की दोनों सीटों को जीतने के लिए यह संख्या बल पूरी तरह पर्याप्त है। लेकिन इस नए नारे '56 नहीं, 61' के जरिए महागठबंधन यह दावा कर रहा है कि चुनाव के दौरान उन्हें 56 नहीं, बल्कि 61 विधायकों का समर्थन मिलने वाला है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सत्ता पक्ष इसके जरिए विरोधी खेमे (NDA) के 5 विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग किए जाने का बड़ा दावा कर रहा है।
झारखंड विधानसभा का मौजूदा गणित
झारखंड विधानसभा में कुल 81 सीटें हैं। कागज पर देखा जाए तो महागठबंधन का पलड़ा बेहद मजबूत है, क्योंकि उनके पास बहुमत के 56 विधायक (JMM के 34, कांग्रेस के 16, आरजेडी के 4 और भाकपा माले के 2) मौजूद हैं। दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन (NDA) के पास विधायकों की संख्या काफी कम है। हालांकि, राज्यसभा चुनाव में अक्सर होने वाले गुप्त मतदान के कारण अंदरूनी उलटफेर की संभावनाएं हमेशा बनी रहती हैं, इसलिए दोनों ही खेमे फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं।
रिजॉर्ट पॉलिटिक्स और बैठकों का दौर शुरू
चुनाव के दौरान किसी भी अप्रत्याशित स्थिति या विधायकों के टूटने के डर से सभी राजनीतिक दलों ने अपनी घेराबंदी तेज कर दी है। अपने विधायकों को एकजुट रखने के लिए लगातार बैठकों, मॉक पोल (वोटिंग का अभ्यास) और रणनीतियों का दौर चल रहा है। माहौल ऐसा है कि विपक्षी खेमे के विधायकों को रांची के एक आलीशान होटल में ठहराया गया है, जिसे लेकर कांग्रेस ने तंज भी कसा है। वहीं, मुख्यमंत्री आवास पर भी लगातार बैठकों के जरिए रणनीति को अंतिम रूप दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह चुनाव सिर्फ सीटों की जीत-हार का नहीं, बल्कि दोनों गठबंधनों के लिए अपनी संगठनात्मक एकजुटता साबित करने की बड़ी परीक्षा है।

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