विपक्ष के दबाव के बावजूद कुर्सी पर कायम Mamata Banerjee, जानिए वजह
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में जारी राजनीतिक और कानूनी रस्साकशी के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पद से इस्तीफा न देने का कड़ा फैसला लिया है, जिसे एक सोची-समझी रणनीतिक चाल माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस का यह रुख महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के मामले से मिली सीख पर आधारित है। दरअसल, महाराष्ट्र सत्ता संकट के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि उद्धव ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट से पहले इस्तीफा नहीं दिया होता, तो अदालत उनकी सरकार की बहाली पर विचार कर सकती थी। इसी कानूनी पेच को ध्यान में रखते हुए ममता बनर्जी किसी भी दबाव में पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं, ताकि संवैधानिक लड़ाई में उनकी स्थिति कमजोर न पड़े।
उद्धव ठाकरे मामले से मिली कानूनी सीख
ममता बनर्जी के इस निर्णय के पीछे सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है जिसमें कहा गया था कि इस्तीफा दे देने के कारण पुरानी स्थिति को बहाल करना संभव नहीं है। तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि मुख्यमंत्री अपने पद पर बनी रहती हैं, तो भविष्य में किसी भी कानूनी चुनौती या संवैधानिक संकट की स्थिति में अदालत से राहत मिलने की संभावना प्रबल रहेगी। भाजपा जहाँ इसे सत्ता में बने रहने की जिद और एक राजनीतिक पैंतरा बता रही है, वहीं टीएमसी इसे अपना संवैधानिक अधिकार मानकर लंबी कानूनी लड़ाई की तैयारी कर रही है।
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने चुनाव आयोग की भूमिका को कटघरे में खड़ा कर दिया है और स्पष्ट किया है कि जब तक आयोग सभी मतदान केंद्रों के वीडियो फुटेज सार्वजनिक नहीं करता, तब तक वे पीछे नहीं हटेंगी। टीएमसी का आरोप है कि वास्तविक मतदान और घोषित मतगणना के आंकड़ों में भारी विसंगतियां हैं, जो चुनाव परिणामों में बड़े स्तर पर गड़बड़ी की ओर इशारा करती हैं। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि इस पूरे प्रकरण में चुनाव आयोग की मिलीभगत है, और इसी आधार पर वे जनता के बीच अपनी बात रख रहे हैं।
फॉर्म 17C और डेटा के आधार पर मोर्चाबंदी
ममता बनर्जी की पार्टी ने अपनी लड़ाई को मजबूती देने के लिए सभी मतदान केंद्रों के 'फॉर्म 17C' का विस्तृत डेटा संकलित कर लिया है। इसी डेटा को ढाल बनाकर तृणमूल कांग्रेस यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों में धांधली की गई है। मुख्यमंत्री इस बात से भी भली-भांति परिचित हैं कि मौजूदा परिस्थितियों में राज्यपाल सरकार या विधानसभा को भंग करने जैसे कदम उठा सकते हैं, फिर भी वे अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के संरक्षण के लिए एक निर्णायक और लंबी लड़ाई लड़ने के मूड में नजर आ रही हैं।

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