चेर्नोबिल की परमाणु त्रासदी: एक गलती जिससे फूटे परमाणु बम
कीव। 26 अप्रैल 1986 की रात दुनिया के इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है, जब सोवियत संघ (अब यूक्रेन) के चेर्नोबिल में स्थित न्यूक्लियर पावर प्लांट के रिएक्टर-4 में विस्फोट हुआ। इस हादसे को आज 40 साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन इसका असर आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार उस रात एक मामूली टेस्ट के दौरान हुई मानवीय भूल और तकनीकी खामियों ने मिलकर ऐसी तबाही मचाई, जिसने पूरे यूरोप को रेडिएशन की चपेट में ला दिया। विशेषज्ञों के मुताबिक, विस्फोट के बाद निकलने वाला रेडिएशन इतना ज्यादा था कि शुरुआती घंटों में इसका प्रभाव हर घंटे दो परमाणु बमों के बराबर आंका गया। हादसे की शुरुआत एक रूटीन सेफ्टी टेस्ट से हुई थी, जिसमें यह जांचा जा रहा था कि बिजली गुल होने की स्थिति में रिएक्टर को कैसे ठंडा रखा जा सकता है। लेकिन अनुभवहीन स्टाफ और सुरक्षा नियमों की अनदेखी ने स्थिति को भयावह बना दिया। कंट्रोल रॉड्स को जरूरत से ज्यादा बाहर निकाल दिया गया, जिससे रिएक्टर की ऊर्जा अचानक कई गुना बढ़ गई।
जब हालात काबू से बाहर हो गए, तो इमरजेंसी शटडाउन बटन दबाया गया, लेकिन रिएक्टर के डिजाइन में मौजूद खामी ने स्थिति और बिगाड़ दी। दो भीषण विस्फोटों ने 1000 टन वजनी कवर प्लेट को उड़ा दिया और आसमान में जहरीली रेडिएशन की लपटें फैल गईं।
इस हादसे के पहले गवाह बने 25 वर्षीय फायरफाइटर वसिली इग्नातेंको, जिन्हें एक सामान्य आग बुझाने के लिए बुलाया गया था। बिना किसी सुरक्षा उपकरण के वे और उनके साथी आग बुझाने पहुंच गए। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि वे घातक रेडियोएक्टिव पदार्थों के संपर्क में आ चुके हैं।
कुछ ही घंटों में फायरफाइटर्स को उल्टियां, त्वचा में जलन और आंखों में जलन जैसी समस्याएं होने लगीं। धीरे-धीरे उनकी हालत बिगड़ती गई—त्वचा पर फफोले, आंतरिक अंगों का फेल होना और अंततः मौत। वसिली समेत उनके कई साथी कुछ ही हफ्तों में दम तोड़ गए।
इस त्रासदी का केंद्र प्रिपयत शहर था, जहां करीब 50 हजार लोग रहते थे। हादसे के बाद पूरे शहर को खाली कराना पड़ा और आज भी यह ‘घोस्ट सिटी’ बना हुआ है। चेर्नोबिल आपदा ने दुनिया को परमाणु ऊर्जा के खतरों के प्रति आगाह किया। 40 साल बाद भी उस क्षेत्र में रेडिएशन का असर बना हुआ है और यह घटना आज भी मानव भूल और तकनीकी लापरवाही की सबसे बड़ी चेतावनी मानी जाती है।

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