रमज़ान के बाद क्यों मनती है ‘मीठी ईद’? ईद-उल-फितर की तारीख कैसे होती है तय और क्यों कहलाती है ‘मीठी ईद’?
रमज़ान के पूरे महीने रोज़ा रखने के बाद जब चांद नजर आता है, तो हर तरफ एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है. घरों में सफाई, बाजारों में भीड़ और दिलों में खुशी-सब कुछ जैसे एक साथ उमड़ पड़ता है. यही वो पल होता है जब ईद-उल-फितर का त्योहार दस्तक देता है. इसे लोग प्यार से ‘मीठी ईद’ भी कहते हैं. इस दिन सिर्फ इबादत ही नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास भी खास होती है. बच्चे नए कपड़े पहनते हैं, बड़े एक-दूसरे से गले मिलते हैं और हर घर में मीठे पकवानों की खुशबू फैल जाती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसे ‘मीठी ईद’ क्यों कहा जाता है? और इस साल भारत में ईद कब मनाई जाएगी? चलिए आसान भाषा में समझते हैं इस त्योहार की कहानी और इसकी अहमियत.
ईद-उल-फितर क्या है और कैसे तय होती है तारीख
ईद-उल-फितर इस्लाम धर्म के सबसे बड़े त्योहारों में गिना जाता है. यह रमज़ान के खत्म होने की खुशी में मनाया जाता है. इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार रमज़ान नौवां महीना होता है, जिसमें 29 या 30 दिन रोज़े रखे जाते हैं. जैसे ही रमज़ान का आखिरी रोज़ा पूरा होता है, लोग चांद देखने का इंतजार करते हैं. चांद दिखते ही अगले दिन ईद मनाई जाती है. यानी इसकी तारीख हर साल बदलती रहती है और पूरी तरह चांद पर निर्भर होती है.
इस साल कब मनाई जाएगी ईद
इस बार अनुमान लगाया जा रहा है कि सऊदी अरब में 19 मार्च को चांद नजर आ सकता है, जिसके बाद वहां 20 मार्च को ईद मनाई जाएगी. भारत में आमतौर पर एक दिन बाद ईद होती है, ऐसे में यहां 21 मार्च को ईद-उल-फितर मनाए जाने की संभावना है. हालांकि अंतिम फैसला चांद दिखने के बाद ही तय होता है.
क्यों कहते हैं इसे ‘मीठी ईद’
ईद-उल-फितर को ‘मीठी ईद’ कहने के पीछे सबसे आसान वजह है-मीठे पकवान. इस दिन हर घर में सेवइयां, खीर, शीर खुरमा जैसे स्वादिष्ट मीठे व्यंजन बनाए जाते हैं.
घर-घर में मिठास की खुशबू
अगर आपने कभी ईद के दिन किसी मुस्लिम दोस्त के घर का दौरा किया हो, तो आपने जरूर देखा होगा कि मेहमानों का स्वागत मीठे से ही होता है. सेवइयों का स्वाद और उसकी खुशबू इस त्योहार की पहचान बन चुकी है. बच्चे भी इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि उन्हें ‘ईदी’ मिलती है और ढेर सारी मिठाइयां खाने को मिलती हैं.
मीठी ईद के पीछे छिपी कहानी
लेकिन सिर्फ मिठाइयों की वजह से ही इसे ‘मीठी ईद’ नहीं कहा जाता. इसके पीछे एक दिलचस्प धार्मिक मान्यता भी जुड़ी है.
पैगंबर मुहम्मद से जुड़ी परंपरा
कहा जाता है कि 624 ईस्वी में बद्र की लड़ाई में जीत के बाद पैगंबर हजरत मुहम्मद ने खुशी जाहिर करने के लिए मीठा खाया था. इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ईद के दिन मीठा खाने और खिलाने की रिवायत शुरू हुई. इसके अलावा, इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार रमज़ान के दौरान लोगों ने जो संयम रखा, उसके बाद ईद के दिन मिठास के साथ इस खुशी को मनाया जाता है. यानी यह त्योहार सिर्फ खाने-पीने का नहीं, बल्कि सब्र और शुक्रिया का भी है.
ईद का असली मतलब: सिर्फ त्योहार नहीं, एहसास
ईद-उल-फितर सिर्फ एक दिन का जश्न नहीं है, बल्कि पूरे महीने की मेहनत, इबादत और धैर्य का इनाम है.
रिश्तों को जोड़ने का मौका
इस दिन लोग पुराने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं. “ईद मुबारक” कहकर खुशियां बांटते हैं. यही वजह है कि ईद को भाईचारे और मोहब्बत का त्योहार भी कहा जाता है.
जकात और फितरा की अहमियत
ईद से पहले ‘जकात’ और ‘फितरा’ देना भी जरूरी माना जाता है. इसका मतलब है जरूरतमंद लोगों की मदद करना, ताकि हर कोई ईद की खुशी में शामिल हो सके. कई जगहों पर लोग अपने आस-पास गरीब परिवारों को कपड़े, खाना या पैसे देकर उनकी ईद को भी खास बनाते हैं. यही इस त्योहार की असली खूबसूरती है.
बदलते समय में भी कायम है परंपरा
आज भले ही लोग डिजिटल दुनिया में ज्यादा व्यस्त हो गए हों, लेकिन ईद की खुशियां अब भी उतनी ही खास हैं.
सोशल मीडिया से लेकर घर तक जश्न
अब लोग वीडियो कॉल, मैसेज और सोशल मीडिया के जरिए भी ईद की बधाई देते हैं, लेकिन असली मजा तब आता है जब लोग एक-दूसरे के घर जाकर मिलते हैं, साथ बैठते हैं और मीठा खाते हैं. छोटे शहरों और गांवों में तो आज भी ईद का माहौल कुछ अलग ही होता है-मस्जिदों में नमाज, गलियों में रौनक और हर चेहरे पर मुस्कान.

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