विशेष आर्थिक क्षेत्र नीति में सुधार की पहल, नई योजनाओं पर होगा मंथन
केंद्र सरकार ने विशेष आर्थिक क्षेत्रों यानी एसईजेड नीति में बड़े सुधार की दिशा में कदम बढ़ाया है। सरकार ने एसईजेड-2.0 नीति तैयार करने के लिए 17 सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह समिति देश में निर्यात को बढ़ाने और निवेश आकर्षित करने के लिए नई नीति का रोडमैप तैयार करेगी। माना जा रहा है कि इससे उद्योग, निर्यात और रोजगार के क्षेत्र में नए अवसर पैदा हो सकते हैं।सरकार के अनुसार यह समिति एक अवधारणा पत्र तैयार करेगी, जिसमें एसईजेड-2.0 के लिए व्यापक सुधारों के सुझाव दिए जाएंगे। समिति में वाणिज्य मंत्रालय, सीमा शुल्क, नीति आयोग, उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड के प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं। समिति का उद्देश्य मौजूदा एसईजेड नीति को बदलते वैश्विक व्यापार और निवेश माहौल के अनुरूप बनाना है।
एसईजेड-2.0 नीति में किन योजनाओं पर विचार होगा?
समिति निर्यात को बढ़ावा देने से जुड़ी कई योजनाओं का अध्ययन करेगी। इसमें विशेष आर्थिक क्षेत्र, निर्यात उन्मुख इकाइयां, विनिर्माण और गोदाम संचालन, अग्रिम प्राधिकरण और पूंजीगत वस्तुओं के लिए निर्यात प्रोत्साहन जैसी योजनाएं शामिल हैं। इसके अलावा शुल्क मुक्त आयात प्राधिकरण जैसे प्रावधानों को भी नीति में शामिल कर उनके सामंजस्य पर विचार किया जाएगा।
मौजूदा एसईजेड कानून की समीक्षा क्यों की जाएगी?
समिति के कार्यक्षेत्र में एसईजेड अधिनियम 2005 की समीक्षा भी शामिल है। इसका उद्देश्य यह देखना है कि वर्तमान वैश्विक व्यापार और निवेश माहौल में यह कानून कितना प्रभावी है। समिति यह भी जांच करेगी कि क्या मौजूदा नीतियों में कोई ऐसी खामियां हैं जिन्हें दूर करने की जरूरत है।
निवेश और रोजगार को बढ़ाने में एसईजेड की क्या भूमिका होगी?
सरकार चाहती है कि एसईजेड के जरिए देश में घरेलू और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिले। समिति यह भी आकलन करेगी कि विशेष आर्थिक क्षेत्र विनिर्माण, सेवाओं, तकनीकी उन्नयन और मूल्यवर्धन को कितना बढ़ावा दे रहे हैं। इसके साथ ही रोजगार सृजन में इनकी भूमिका का भी अध्ययन किया जाएगा, जिसमें एमएसएमई क्षेत्र को मिलने वाले अवसर भी शामिल होंगे।
उद्योगों को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
समिति एसईजेड डेवलपर्स और कंपनियों को आने वाली समस्याओं की भी पहचान करेगी। इसमें सीमा शुल्क, कर व्यवस्था, नियामकीय प्रक्रियाएं, अनुपालन का बोझ और बुनियादी ढांचे से जुड़ी चुनौतियां शामिल हैं। साथ ही विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच समन्वय की स्थिति का भी अध्ययन किया जाएगा, ताकि नीतिगत सुधार के लिए ठोस सुझाव दिए जा सकें।

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