आधुनिक मॉडल में बदलाव बना घर खरीदारों की मुसीबत
लखनऊ|राजधानी व एनसीआर में रियल एस्टेट के क्षेत्र में बड़ा बदलाव आ गया है। अब बिल्डर फ्लैट, दुकान और पारंपरिक ऑफिस की जगह ऐसे मॉडल लेकर आ गए हैं जो आधुनिक बताए जा रहे हैं लेकिन कानून की कसौटी पर फिट नहीं बैठते। को-वर्किंग स्पेस, होटल रूम पूलिंग और बड़े ऑफिस स्पेस यह तीन मॉडल ऐसे हैं, जिन पर बिल्डरों ने तेजी से काम शुरू किया है लेकिन इन तौर तरीकों ने यूपी रेरा की नींद उड़ा दी है। क्योंकि रेरा कानून में इन पर नियंत्रण की कोई व्यवस्था ही नहीं है। इस मामले में रेरा के सचिव महेन्द्र वर्मा ने 12 जनवरी को एलडीए उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार को पत्र भेजकर उनसे उनका अभिमत मांगा है। ताकि इस पर आगे कार्यवाही की जा सके।
क्या है को-वर्किंग स्पेस का खेल
को-वर्किंग स्पेस का मतलब साझा दफ्तर। इसमें कोई एक कंपनी पूरा ऑफिस नहीं लेती, बल्कि सीट, केबिन या छोटा हिस्सा किराए पर मिलता है। स्टार्टअप, फ्रीलांसर और छोटी कंपनियों के लिए यह सस्ता और सुविधाजनक विकल्प है। लेकिन दिक्कत तब शुरू होती है, जब बिल्डर इसे निवेश के तौर पर बेचने लगते हैं। कई परियोजनाओं में लोगों से कहा जाता है कि वे एक सीट या स्पेस खरीद लें और उसका किराया हर महीने मिलेगा। असल में उस सीट की कोई तय दीवार या स्पष्ट सीमा नहीं होती। रेरा कानून में ऐसी अनिश्चित इकाइयों की बिक्री का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, इसी खाली जगह का फायदा बिल्डरों की ओर से उठाया जा रहा है।
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खरीदार के लिए यह खतरे की घंटी है
इन नए मॉडलों में निवेश करने वाले लोग यह समझ लेते हैं कि वे सुरक्षित संपत्ति खरीद रहे हैं, जबकि असल में वे जोखिम भरे निवेश में फंस जाते हैं। रिटर्न रुकने या विवाद होने पर उनके पास कानूनी विकल्प सीमित रह जाते हैं।
कमरा नहीं, कमाई के वादे का खेल
होटल रूम पूलिंग मॉडल में व्यक्ति होटल का एक कमरा खरीदता है, लेकिन उसका इस्तेमाल खुद नहीं करता। सारे कमरे एक पूल में डाल दिए जाते हैं और होटल प्रबंधन उन्हें चलाता है। कमाई होती है और मुनाफा सभी मालिकों में बांटा जाता है। यह मॉडल निवेशकों को आकर्षक रिटर्न का सपना दिखाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि खरीदार को कमरे से ज्यादा एक कमाई का वादा मिलता है। रेरा कानून होटल और आवासीय संपत्ति को अलग-अलग देखता है, ऐसे में होटल रूम पूलिंग किसी एक श्रेणी में फिट नहीं बैठता।
कागजों में मालिक एक पर उपयोगकर्ता कई
बड़े ऑफिस स्पेस में पूरा फ्लोर या बड़ा एरिया एक ही यूनिट के रूप में बेचा जाता है। कागजों में मालिक एक होता है, लेकिन अंदर से उस जगह को कई कंपनियों को इस्तेमाल के लिए दे दिया जाता है। बिल्डर यह कहकर बिक्री करता है कि निवेशक को तय किराया मिलेगा। विवाद की स्थिति में सवाल उठता है कि जिम्मेदारी किसकी है बिल्डर, ऑपरेटर या मालिक की, कानून में स्पष्ट जवाब न होने से खरीदार सबसे ज्यादा उलझता है।

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