सर्वे के अनुसार, भारतीय अर्थव्यवस्था 2025-26 में तेज़ी से आगे बढ़ेगी
उद्योग जगत का मानना है कि सरकार ने अब तक जो सुधार किए हैं, उनका सकारात्मक असर अगले वित्त वर्ष में वृद्धि दर को आगे बढ़ाने में दिखेगा। राजकोषीय नीतियों को इन प्राथमिकताओं के साथ जोड़कर आगामी बजट आर्थिकी में समानता और दक्षता सुनिश्चित करते हुए वृद्धि के लिए उत्प्रेरक का कार्य कर सकता है। यह सर्वे विभिन्न उद्योगों के 155 से अधिक लोगों से बातचीत पर आधारित है। संयुक्त राष्ट्र ने कैलेंडर वर्ष 2025 के लिए वृद्धि अनुमान को 6.6 फीसदी पर बरकरार रखा है।
रुपये की गिरावट और घटते विदेशी निवेश को देखते हुए नीति में संशोधन की आवश्यकता
सुझाव मूडीज एनालिटिक्स ने 2025 के लिए भारत की जीडीपी वृद्धि दर के अनुमान के संदर्भ में दिया है। इसका मतलब है कि अगर भारत को 2025 में 6.4% की आर्थिक वृद्धि हासिल करनी है, तो सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को अपनी नीतियों में कुछ अहम बदलाव करने होंगे।
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रुपये की गिरावट: रुपये की मूल्य में गिरावट से भारतीय व्यापार पर नकारात्मक असर हो सकता है, खासकर अगर विदेशी निवेश में कमी आ रही हो। इस समस्या का समाधान करने के लिए सरकार को अपनी मौद्रिक नीति को समायोजित करने की जरूरत होगी, ताकि रुपये की स्थिति बेहतर हो सके।
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घटता विदेशी निवेश: भारत में विदेशी निवेश कम हो रहा है, जो आर्थिक वृद्धि को प्रभावित कर सकता है। इसके लिए सरकार को ऐसे उपाय करने होंगे, जिससे निवेशकों का विश्वास मजबूत हो और विदेशी निवेश बढ़े।
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महंगाई का दबाव: महंगाई और अस्थिरता से घरेलू बाजार में मांग कम हो सकती है, जिससे आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है। इस पर काबू पाने के लिए, सरकार को अपनी राजकोषीय नीति में सुधार करते हुए महंगाई को नियंत्रित करने के उपायों पर ध्यान देना होगा।
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ऊंची ब्याज दरें: लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों का असर घरेलू मांग पर पड़ सकता है, क्योंकि लोगों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है। सरकार और RBI को नीति में बदलाव कर ब्याज दरों को संतुलित रखने की आवश्यकता हो सकती है।
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निर्यात पर असर: अमेरिका जैसे देशों द्वारा भारतीय आयातों पर शुल्क बढ़ाने से निर्यात क्षेत्र को चुनौती मिल सकती है, जिससे आर्थिक वृद्धि पर असर पड़ सकता है। इसके लिए निर्यात नीति में बदलाव की जरूरत हो सकती है।
इन समस्याओं को हल करने के लिए राजकोषीय (सरकारी खर्च और कर नीतियां) और मौद्रिक नीति (ब्याज दरें और मुद्रा आपूर्ति नियंत्रण) में बदलाव आवश्यक हैं। इससे भारत की आर्थिक वृद्धि दर को 6.4% तक पहुंचाने के लिए एक स्थिर और संतुलित वातावरण बनेगा।

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